तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कृषक जागरूकता गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में किसानों को तिलहन फसल की उत्पादकता के बारे में कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा विस्तृत जानकारी दी गई।
जनपद में तिलहन की उत्पादन एवं उत्पादकता को बढावा देने के उद्देश्य से नेशनल मिशन आन एडीबल आयलसीड के अन्तर्गत कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा लगातार जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। सोमवार को ‘‘तिल में पोषक तत्व प्रबन्धन’विषय पर कृषक प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। केेन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा0 श्याम सिंह ने किसानों को बताया कि तिल की फसल एवं तिलहनी फसल है। इसके अच्छे उत्पादन एवं गुणवत्ता वाले उत्पादन के लिये सल्फर का प्रयोग महत्वपूर्ण है। तिल की फसल में प्रति हेक्टेयर 10 टन गोबर की खडी खाद के साथ-साथ सिंचित दशा में 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस,40 कि0ग्रा0 पोटाश एवं 30 कि0ग्रा0सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से पूरी मात्रा बुवाई के समय ही प्रयोग करनी चाहिये। असिंचित दशा में इन सभी की मात्रा को आधा कर देना चाहिये। नैनो डीएपी 10 मि0ली0 प्रति किलोग्राम की दर से बीजोपचार करने से लाभ होता है। रासायनिक खादों की जगह नैनो डीएपी एवं नैनो यूरिया का प्रयोग भी अच्छा रहता है। बुवाई के 25-30 दिन पश्चात 5 मि0ली0/लीटर पानी मेें नैनो यूरिया एवं नैनो डीएपी का छिडकाव करना चाहिये। नैनो यूरिया का दूसरा छिडकाव पहले छिडकाव के 25 दिन बाद करना चाहिये। सल्फर का प्रयोग बुवाई के समय करने पर ज्यादा लाभ मिलता है। तिल की सफलता में खेत का चयन महत्वपूर्ण है। तिल के लिये हल्की मिट्टी अच्छी रहती है एवं ढालू खेत जिसमें पानी खडा न होता हो। अति वर्षा की स्थिति में खेत से तुरन्त पानी निकालना आवश्यक है। खरपतवार (शुरू से एक माह तक) खुरपी से निकालना चाहिये। खरपतवार नाशी यदि प्रयोग करना है तो पैण्डीमैथालीन 1.0 ली0/हे0 की दर से 800 ली0 पानी में मिलाकर बुवाई के तुरन्त बाद प्रयोग करें। छिडकाव विधि से बोये खेतों में खरपतवार नाशी से जमाव प्रभावित हो सकता है। कार्यक्रम में तीन ग्रामों के 30 कृषकों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम के अन्त में डा0 दीक्षा पटेल ने सभी कृषकों का कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम में ई0 अजीत कुमार निगम,घनश्याम यादव,कमलनारायण बाजपेयी एवं अंकिता निगम आदि मौजूद रहे।