बाँदा-मुक्ति पर्व पर गूंजा आंतरिक स्वतंत्रता और ब्रह्मज्ञान का संदेश

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संत निरंकारी सत्संग भवन बांदा में शनिवार को मुक्ति पर्व के अवसर पर विशाल सत्संग का आयोजन किया गया। प्रयागराज से आए केंद्रीय ज्ञान प्रचारक संत श्री रामललक शुक्ला की उपस्थिति में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। सत्संग में संतों के त्याग, सेवा और मानवता के प्रति समर्पण को स्मरण करते हुए आंतरिक मुक्ति और ब्रह्मज्ञान का संदेश दिया गया।
नफरत और अहंकार से मुक्ति ही सच्ची आजादी
मुख्य आयोजन दिल्ली स्थित निरंकारी सरोवर के समक्ष परम श्रद्धेय सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में हुआ। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि सच्ची मुक्ति बाहरी बंधनों से नहीं, बल्कि नफरत, अहंकार, छोटी सोच और पूर्वाग्रहों से मुक्त होने में है। हर सांस में निराकार का एहसास रखते हुए प्रेम, भक्ति और स्वीकार्यता के साथ जीवन जीना ही जीते-जी मुक्ति है।
परिस्थितियां कैसी भी हों, भीतर की रोशनी कायम रखें
सतगुरु माता जी ने माता सविंदर जी के जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान करते हुए लाइट हाउस का उदाहरण दिया। कहा कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, मनुष्य को अपने भीतर शांति, प्रेम और सकारात्मकता की रोशनी बनाए रखनी चाहिए। संतों की शिक्षाओं को केवल सुनना नहीं, बल्कि विचार, व्यवहार और कर्म में उतारना ही वास्तविक साधना और मुक्ति का मार्ग है।
त्याग और सेवा करने वाले संतों को किया नमन
मुक्ति पर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं ने उन महान संत विभूतियों को श्रद्धापूर्वक नमन किया, जिनके त्याग एवं समर्पण ने मानवता को मुक्तिमार्ग की ओर अग्रसर किया। विश्वभर में निरंकारी मिशन की विभिन्न शाखाओं में भी विशेष सत्संग आयोजित कर संत विभूतियों को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए।
1964 में शुरू हुई थी मुक्ति पर्व की परंपरा
मुक्ति पर्व का आरंभ वर्ष 1964 में जगत माता बुद्धवंती जी की पावन स्मृति में हुआ था। वर्ष 1969 में शहनशाह बाबा अवतार सिंह जी के ब्रह्मलीन होने के बाद यह दिवस ‘शहनशाह-जगतमाता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। वर्ष 1979 में संत निरंकारी मंडल के प्रथम प्रधान संत लाभ सिंह जी की स्मृति को भी इससे जोड़ते हुए बाबा गुरबचन सिंह जी ने इसे ‘मुक्ति पर्व’ के रूप में स्थापित किया।
माता सविंदर जी का जीवन श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणास्रोत
वर्ष 2018 से युगनिर्माता माता सविंदर जी को भी इस पावन अवसर पर श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है। उनके वात्सल्य, विनम्रता, त्याग और निष्काम सेवा से परिपूर्ण जीवन को श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा, मार्गदर्शन और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत बताया गया। मिशन और मानवता की सेवा में निःस्वार्थ भाव से जुटे भक्तों एवं सेवादारों के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त की गई।
ब्रह्मज्ञान की ज्योति से मानव को मिलता है वास्तविक पहचान का बोध
सत्संग में कहा गया कि जिस प्रकार भौतिक स्वतंत्रता राष्ट्र की प्रगति और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान की दिव्य ज्योति मानव को उसकी वास्तविक पहचान का बोध कराती है। यह मनुष्य को प्रेम, सद्भाव और भाईचारे के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। मुक्ति पर्व का मूल संदेश बाहरी आजादी के साथ मनुष्य को भीतर से भी स्वतंत्र बनाने का है।
UP TIMES NEWS
Author: UP TIMES NEWS

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