चीफ जस्टिस के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने के मामले में एक कानून छात्र को नोटिस जारी किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने प्रशासनिक कार्रवाई के तरीके पर सवाल उठाते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े पहलुओं को गंभीरता से लिया।
नई दिल्ली। मामला ग्रेटर नोएडा स्थित गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष के कानून छात्र सौरव दास से जुड़ा है। सौरव दास को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में शामिल होने के बाद ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से पांच लाख रुपये के निजी मुचलके से संबंधित नोटिस जारी किया गया था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर अदालत ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने वाले छात्र के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई किस आधार पर की गई। अदालत की टिप्पणी को नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति के अधिकार के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पांच लाख रुपये के बांड का था नोटिस
रिपोर्ट के मुताबिक सौरव दास को प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर शांति बनाए रखने के लिए पांच लाख रुपये का निजी बांड देने संबंधी नोटिस भेजा गया था। बाद में पुलिस की ओर से बताया गया कि यह नोटिस 4 सितंबर को ही वापस लिया जा चुका है। इसके बावजूद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां अदालत ने नोटिस जारी करने के तरीके पर सवाल उठाए। कानून छात्रों को लेकर भी अहम फैसला
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कानून के छात्रों से जुड़े एक मामले में कहा था कि अधिवक्ता के रूप में नामांकन से पहले बार काउंसिल ऑफ इंडिया या राज्य बार काउंसिल कानून के छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सकते। ऐसे मामलों में संबंधित शैक्षणिक संस्थान और उसके निर्धारित नियम महत्वपूर्ण होते हैं।