नाबालिग बच्चों के साथ यौन शोषण करने के साथ लाखों वीडियो बनाने के मामले में अदालत ने जेई व उसकी पत्नी को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई है। साथ ही यह भी आदेश दिया है कि अभियुक्तों को तब तक फांसी पर लटकाया जाए। जब तक इनकी मौत न हो जाये।
लोक अभियोजक सौरभ सिंह ने बताया की नाबालिग बच्चों के साथ हुए संगठित यौन शोषण के एक अत्यंत गंभीर और जघन्य मामले में विशेष न्यायालय पास्को एक्ट बांदा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दो मुख्य दोषियों राम भवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को मृत्युदंड की सजा दी है। आरोपी चित्रकूट में सिंचाई विभाग में जेई था।सीबीआई दिल्ली द्वारा अक्टूबर 2020 को रिपोर्ट दर्ज की गई। जिसमें अभियुक्त जेई राम भवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को अभियुक्त बनाया। अभियोजन की ओर से सीबीआई से विशेष अभियोजक धारा सिंह ने मुक़दमे की पैरवी की। जिसमें बताया कि अभियुक्त थाना नरैनी का निवासी है और चित्रकूट में किराये के घर में रह कर करीब 33 नाबालिक बच्चों के यौन शोषण कर वीडियो बना कर विदेशों में भेजे थे। जांच में पता चला कि इसने करीब 2 लाख से ज्यादा वीडियो बना कर भेजे थे। मुक़दमे में कुल 74 गवाह अदालत में पेश किए गए। अभियुक्तों को दोषी पाते हुए न्यायालय द्वारा दोनों को मृत्युदंड की सजा सुनाई और अपने फैसले में कहा कि दोषियों को “तब तक फांसी पर लटकाया जाए, जब तक उनकी मृत्यु न हो जाए।” एसपी पलाश बंसल ने कहा फैसला देश में नाबालिगों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कड़ा संदेश माना जा रहा है।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार,आरोपियों ने कई वर्षों तक नाबालिग बच्चों को बहला-फुसलाकर और धमकाकर उनका शारीरिक व मानसिक शोषण किया। पीड़ितों की उम्र 3 वर्ष से 18 वर्ष से कम के बीच बताई गई। मामले की जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने बच्चों के आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें बनाईं। जिन्हें देश से बाहर करीब 47 देशों में भेजा गया था। जिनका इस्तेमाल ब्लैकमेलिंग और अन्य आपराधिक गतिविधियों के लिए किया गया। विशेष न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध), 506 (आपराधिक धमकी), 120B (आपराधिक साजिश), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67-बी तथा पॉक्सो अधिनियम, 2012 की कई गंभीर धाराओं के तहत दोषियों को दोषी ठहराया। कोर्ट ने दोषियों को मृत्युदंड और आजीवन कारावास, कठोर कारावास और भारी जुर्माने की सजा सुनाई।
कोर्ट ने अपने फैसले में सभी पीड़ित बच्चों को 10- 10 लाख रुपये देने का भी आदेश पारित किया है औऱ सजा में किए गए जुर्माने को भी बच्चों को देने का आदेश पारित किया है और टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे अपराध न केवल पीड़ित बच्चों के जीवन को बर्बाद करते हैं, बल्कि समाज की नैतिक नींव को भी हिला देते हैं। इधर न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि ऐसे मामलों में सख्ती नहीं बरती गई, तो यह समाज के लिए खतरनाक संदेश होगा। अदालत ने पीड़ित बच्चों के पुनर्वास, मनोवैज्ञानिक उपचार और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार और संबंधित विभागों को ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों को उचित मुआवजा, काउंसलिंग और शिक्षा-संबंधी सहायता उपलब्ध कराई जाए यह फैसला न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा सुनाया गया। बता दे कि न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा जी ने 6 महीने में ये तीसरा फैसला सुनाया है। जिसमें दोनों अभियुक्तों को मृत्युदंड की सजा दी है। इसके पहले 2 मामलों में भी मृत्युदंड की सजा सुनाई जा चुकी है।