संत निरंकारी सत्संग भवन अलीगंज में जोनल स्तरीय इंग्लिश मीडियम समागम का आयोजन किया गया।कार्यक्रम अशोक जुनेजा (केन्द्रीय प्रचारक) की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में शहर बाँदा के अलावा हमीरपुर,महोबा, चित्रकूट,भरूआ सुमेरपुर, बिवांर, मौदहा आदि शाखाओं से बच्चों,बहनों ने प्रतिभाग किया। समागम में उपस्थित लोगो को संबोधित करते हुए अशोक जुनेजा ने कहा कि संत निरंकारी मिशन प्रकृति के अन्दर समस्त मानव जाति को एक सूत्र में पिरोकर अपना परिवार मानता है। निरंकारी मिशन प्रकृति को 9 भागों में बाँटकर इनको बनाने वाले सर्वशक्तिमान निरंकार प्रभु को इन सबके बीच उपस्थित रहते हुए इसकी रजा में रहना ही भक्ति है। निरंकारी मिशन का आधार ब्रम्हज्ञान है। ब्रम्हज्ञानी सतगुरु के प्रत्येक वचन को इलाही फरमान मानता है। जहाँ गुरु का गुरुसिख सत्संग को प्राथमिकता देता है। वहीं सांसारिक विचारधारा के लोग आध्यात्मिक कार्यों को रोककर या देरी से जाने का कारण अपने दुनियावी कार्यों को करते हैं। जैसे दक्षिण भारत में कुछ विशेष लोग होते हैं, जिन्हें हिन्दी समझ में नहीं आती, लेकिन जब उनसे पूछा गया कि आपको हिन्दी समझ में नहीं आती फिर भी आप सत्संग में समय से आते हैं और पूरे समय रहते हैं। तो उनका उत्तर था कि गुरु का आदेश है, और गुरु के आदेश को मानना ही भक्ति है। ये संसार निरंकार प्रभु की छाया है,जैसे किसी व्यक्ति को किसी गाड़ी में बैठकर अपनी यात्रा को तय करना होता है तो उसे अपनी छाया को नहीं कहना पड़ता कि तुम भी साथ बैठो, छाया तो साथ-साथ चलती है। इसी प्रकार यदि इस निराकार प्रभु परमपिता परमात्मा को हर समय अपने एहसास में रखते हैं तो यह समाज, संसार या हमारी सांसारिक जिम्मेदारी स्वतः पूरी हो जाती है।
इस निराकार प्रभु का स्वभाव है सबसे प्रेम, सदभाव एवं भाईचारा स्थापित करना न कि किसी से नफ़रत करना। किसी भी जीवात्मा से नफरत करना अर्थात निरंकार से नफरत करना है। इसलिए गुरुसिख हमेशा प्रकृति के प्रत्येक वस्तु,व्यक्ति में इनके ही दर्शन करके अपनी भक्ति को पूर्णता की ओर ले जाता है, जैसे सम्पूर्ण अवतारवाणी में कहा है कि नौ चीजें दृश्यमान है, इनको कहते माया है।
दशवां ब्रम्ह इनसे न्यारा, इनके बीच समाया है। सत्संग के बाद सभी श्रद्धालु ने लंगर (प्रसाद) ग्रहण किया।