संत निरंकारी सत्संग भवन शास्त्री नगर में भक्ति पर्व समागम के अवसर पर सत्संग का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में सुदीक्षा महाराज ने कहा कि
भक्ति केवल शब्द नहीं जीवन जीने की सजग यात्रा है। निरंकारी राजपिता रमित के मौजूदगी में श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास की अनुपम छटा देखने को मिली।दिल्ली-एन.सी.आर सहित देश-विदेश से आये श्रद्धालुओ ने संत समागम में सहभागिता करते हुए सत्संग के माध्यम से आध्यात्मिक आनंद एवं आत्मिक शांति की अनुभूति प्राप्त की। संत संतोख सिंह सहित अन्य संत महापुरुषों के तप,त्याग एवं उनके ब्रह्मज्ञान के प्रचार-प्रसार में दिए गए अमूल्य योगदान का भावपूर्ण स्मरण किया।
समागम के दौरान अनेक वक्ताओं, कवियों एवं गीतकारों ने अपनी-अपनी विधाओं के माध्यम से गुरु महिमा,भक्ति भाव और मानव कल्याण के संदेशों को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। संतों की प्रेरणादायक शिक्षाओं ने उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय को छूते हुए उनके जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध किया। भक्ति की महिमा पर प्रकाश डालते हुए सतगुरु माता ने कहा कि भक्ति कोई नाम या दिखावा नहीं,बल्कि अपने भीतर की सजग यात्रा है। सच्ची भक्ति तब है, जब हम आत्म मंथन द्वारा दूसरों से पहले स्वयं को जाँचें, अपनी कमियों को सुधारें और हर पल जागरूक जीवन जिएँ। अज्ञान में हुई गलती सुधर सकती है, पर जानबूझकर चोट पहुँचाना,बहाने या चालाक शब्द भक्ति नहीं हैं। क्योंकि भक्त का स्वभाव मरहम का होता है। हर एक में निराकार देखकर सरल, निष्कपट व्यवहार करना और ब्रह्मज्ञान के बाद सेवा, सुमिरन व सत्संग से इस एहसास को बनाए रखना ही भक्ति है। निरंकारी राजपिता ने भक्ति पर्व के अवसर पर यह समझाया कि भक्ति कोई पद,पहचान या अपनी बनाई परिभाषा नहीं,बल्कि ब्रह्मज्ञान पाकर करता-भाव के समाप्त होने से उपजा जीवन जीने का ढंग है। संतों ने वचन इसलिए माने क्योंकि गुरु का वचन मानना उनके लिए स्वाभाविक था। जबकि हम कई बार न मानने को भी सही ठहरा लेते हैं। सत्य और भक्ति की परिभाषा एक ही है। यदि भक्ति को उपलब्धियों या अहंकार से जोड़ा जाए तो करता-भाव जीवित रहता है। भक्ति कोई सौदा नहीं, प्रेम का चुनाव है। जहाँ प्रयास रहते हैं, पर दावा नहीं इसलिए अरदास यही है कि अपनी सारी परिभाषाएँ छोड़कर ऐसा जीवन जिएँ जहाँ वचन, सेवा,सुमिरन और संगत स्वभाव बन जाएँ क्योंकि भक्ति अपनी परिभाषा से हो, तो भक्ति नहीं। निरंकारी मिशन का मूल सिद्धांत यही है कि भक्ति, परमात्मा के तत्व को जानकर ही अपने वास्तविक एवं सार्थक स्वरूप को प्राप्त करती है।